Amazing Sankrit slokas and others

ॐ कृष्णाय वासुदेवाय हरये परमात्मने ।

प्रणतः क्लेशनाशाय गोविंदाय नमो नमः ॥

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अपराजित नमस्ते अस्तु नमस्ते रामपूजित

प्रस्थानंच करिष्यामि सिद्धिर्भवतु मे सदा ||

 

दीपज्योतिः परब्रह्म दीपज्योतिर्जनार्दनः ।

दीपो हरतु मे पापं दीपज्योतिर्नमोऽस्तुते ॥

 

Deep – Jyoti is the Supreme Brahman, the light of the lamp is the protector of the world.

O divine lamp, wash away all my sins. Greetings to you, the divine lamp of the evening.

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I am not who you think I am; I am not who I think I am; I am who I think you think I am”

Charles Horton Cooley

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प्रभु कीं कृपा भयउ सबु काजू। जन्म हमार सुफल भा आजू |

अपराजित नमस्ते अस्तु नमस्तस्य श्री राम पूज्यते प्रस्ताना करिष्यमी

 

शुभं करोति कल्याणमारोग्यं धनसंपदा ।

शत्रुबुद्धिविनाशाय दीपज्योतिर्नमोऽस्तुते ॥

 

 

अस्थिरं जीवितं लोके अस्थिरे धनयौवने।*

*अस्थिरा: पुत्रदाराश्र्च धर्मकीर्तिद्वयं स्थिरम्॥*

 

*भावार्थ*

इस जगत में जीवन सदा नहीं रहने वाला है, धन और यौवन भी सदा नहीं रहने वाले हैं, पुत्र और स्त्री भी सदा नहीं रहने वाले हैं। केवल धर्म और कीर्ति ही सदा रहने वाले हैं।

 

नैवाकृतिः फलति नैव कुलं न शीलं*

*विद्यापि नैव न च यत्नकृतापि सेवा।*

*भाग्यानि पूर्वतपसा किल संचितानि*

*काले फलन्ति पुरुषस्य यथैव वृक्षाः।।*

 

*अर्थात्* मनुष्य की आकृति, कुल, चरित्र, विद्या या यत्नपूर्वक की गई सेवा- इन में से कुछ भी तत्काल फलीभूत होता नहीं है।

परंतु जैसे वृक्ष समय आने पर ही फल देते हैं, ठीक उसी प्रकार पूर्व में किए गए तप से संचित हुए कर्म योग्य समय पर मनुष्य को फल देते हैं।

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"उनचास मारुत" और तुलसी बाबा...

 

सुंदरकांड के 25वें दोहे में गूढ़ रहस्य से छिपा है जिसकी जानकारी से आधुनिक मौसम विज्ञान भी अनभिज्ञ है..!

 

जब हनुमान जी ने लंका मे आग लगाई, तब बाबा तुलसीदास जी लिखाशते हैं:

 

हरि प्रेरित तेहि अवसर चले मरुत उनचास l

अट्टहास करि गर्जा कपि बढ़ि लाग अकास ll

 

अर्थात :- जब हनुमान जी ने लंका को अग्नि के हवाले कर दिया तो वे उनचासों पवन चलने लगे। हनुमान जी अट्टहास करके गर्जे और आकार बढ़ाकर आकाश मार्ग से जाने लगे..!!

 

इन उनचास मरुत का क्या अर्थ है ?

 

तुलसीदासजी के वायु ज्ञान पर सुखद आश्चर्य होता है, जिससे शायद आधुनिक मौसम विज्ञान भी अनभिज्ञ है..!!

 

यह जानकर आश्चर्य होगा कि वेदों में वायु की 7 शाखाओं के बारे में विस्तार से वर्णन मिलता है। अधिकतर लोग यही समझते हैं कि वायु तो एक ही प्रकार की होती है, किंतु उसका रूप बदलता रहता है, जैसे कि ठंडी वायु, गर्म वायु और समवायु, लेकिन ऐसा नहीं है..!!

 

जल के भीतर जो वायु है उसका शास्त्रों में अलग नाम दिया गया है और आकाश में स्थित जो वायु है उसका नाम अलग है। अंतरिक्ष में जो वायु है उसका नाम अलग और पाताल में स्थित वायु का नाम अलग है। नाम अलग होने का मतलब यह कि उसका गुण और व्यवहार भी अलग ही होता है। इस तरह वेदों में 7 प्रकार की वायु का वर्णन मिलता है..!!

 

ये 7 प्रकार हैं- 1. प्रवह, 2. आवह, 3. उद्वह, 4. संवह, 5. विवह, 6. परिवह और 7. परावह..!!

 

1. प्रवह :- पृथ्वी को लांघकर मेघमंडलपर्यंत जो वायु स्थित है, उसका नाम प्रवह है। इस प्रवह के भी प्रकार हैं। यह वायु अत्यंत शक्तिमान है और वही बादलों को इधर-उधर उड़ाकर ले जाती है। धूप तथा गर्मी से उत्पन्न होने वाले मेघों को यह प्रवह वायु ही समुद्र जल से परिपूर्ण करती है जिससे ये मेघ काली घटा के रूप में परिणित हो जाते हैं और अतिशय वर्षा करने वाले होते हैं..!!

 

2. आवह :- आवह सूर्यमंडल में बंधी हुई है। उसी के द्वारा ध्रुव से आबद्ध होकर सूर्यमंडल घुमाया जाता है..!!

 

3. उद्वह :- वायु की तीसरी शाखा का नाम उद्वह है, जो चन्द्रलोक में प्रतिष्ठित है। इसी के द्वारा ध्रुव से संबद्ध होकर यह चन्द्र मंडल घुमाया जाता है..!!

 

4. संवह :- वायु की चौथी शाखा का नाम संवह है, जो नक्षत्र मंडल में स्थित है। उसी से ध्रुव से आबद्ध होकर संपूर्ण नक्षत्र मंडल घूमता रहता है..!!

 

5. विवह :- पांचवीं शाखा का नाम विवह है और यह ग्रह मंडल में स्थित है। उसके ही द्वारा यह ग्रह चक्र ध्रुव से संबद्ध होकर घूमता रहता है..!!

 

6.परिवह :- वायु की छठी शाखा का नाम परिवह है, जो सप्तर्षिमंडल में स्थित है। इसी के द्वारा ध्रुव से संबद्ध हो सप्तश्रर्षि आकाश में भ्रमण करते हैं..!!

 

7. परावह :- वायु के सातवें स्कंध का नाम परावह है, जो ध्रुव में आबद्ध है। इसी के द्वारा ध्रुव चक्र तथा अन्यान्य मंडल एक स्थान पर स्थापित रहते हैं..!!

 

इन सातों वायु के सात-सात गण (संचालित करने वाले) हैं जो निम्न जगह में विचरण करते हैं:

ब्रह्मलोक, इंद्रलोक, अंतरिक्ष, भूलोक की पूर्व दिशा, भूलोक की पश्चिम दिशा, भूलोक की उत्तर दिशा और भूलोक कि दक्षिण दिशा।

इस तरह 7x7=49, कुल 49 मरुत हो जाते हैं जो देव रूप में विचरण करते रहते हैं..!!

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जन्मदिनमिदम् अयि प्रिय सखे

शंतनोतु हि सर्वदा मुदम् ।।

प्रार्थयामहे भव शतायु:

ईश्वर सदा त्वाम् च रक्षतु ।।

पुण्य कर्मणा कीर्तिमार्जय

जीवनम् तव भवतु सार्थकम्

 

O! Friend may this birthday of yours Bring in auspiciousness and happiness.

We pray that you enjoy hundred beautiful years of life and May the Lord always protect you.

May you earn fame by your virtuous actions and May your life be fulfilling

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किस रोग में कौन सा आसन करें, एक बार पोस्ट पढ़े और इसे सेव करके सुरक्षित कर लें 🙏

 

◆ पेट की बिमारियों में- उत्तानपादासन, पवनमुक्तासन, वज्रासन, योगमुद्रासन, भुजंगासन, मत्स्यासन।

 

◆ सिर की बिमारियों में- सर्वांगासन, शीर्षासन, चन्द्रासन।

 

◆ मधुमेह- पश्चिमोत्तानासन, नौकासन, वज्रासन, भुजंगासन, हलासन, शीर्षासन।

 

◆ वीर्यदोष– सर्वांगासन, वज्रासन, योगमुद्रा।

 

◆ गला- सुप्तवज्रासन, भुजंगासन, चन्द्रासन।

 

◆ आंखें- सर्वांगासन, शीर्षासन, भुजंगासन।

 

◆ गठिया– पवनमुक्तासन, पद्मासन, सुप्तवज्रासन, मत्स्यासन, उष्ट्रासन।

◆ नाभि- धनुरासन, नाभि-आसन, भुजंगासन।

 

◆ गर्भाशय– उत्तानपादासन, भुजंगासन, सर्वांगासन, ताड़ासन, चन्द्रानमस्कारासन।

 

◆ कमर दर्द – हलासन, चक्रासन, धनुरासन, भुजंगासन।

 

◆ फेफड़े- वज्रासन, मत्स्यासन, सर्वांगासन।

 

◆ यकृत- लतासन, पवनमुक्तासन, यानासन।

 

◆ गुदा,बवासीर,भंगदर आदि में- उत्तानपादासन, सर्वांगासन, जानुशिरासन, यानासन।

 

◆ दमा- सुप्तवज्रासन, मत्स्यासन, भुजंगासन।

 

◆ अनिद्रा- शीर्षासन, सर्वांगासन, हलासन, योगमुद्रासन।

 

◆ गैस– पवनमुक्तासन, जानुशिरासन, योगमुद्रा, वज्रासन।

 

◆ जुकाम– सर्वांगासन, हलासन, शीर्षासन।

 

◆ मानसिक शांति के लिए– सिद्धासन, योगासन, शतुरमुर्गासन, खगासन योगमुद्रासन।

 

◆ रीढ़ की हड्डी के लिए- सर्पासन, पवनमुक्तासन, सर्वांगासन, शतुरमुर्गासन करें।

 

◆ गठिया के लिए- पवनमुक्तासन, साइकिल संचालन, ताड़ासन किया करें।

 

◆ गुर्दे की बीमारी में– सर्वांगासन, हलासन, वज्रासन, पवनमुक्तासन करें।

 

◆ गले के लिए- सर्पासन, सर्वांगासन, हलासन, योगमुद्रा करें।

 

◆ हृदय रोग के लिए- शवासन, साइकिल संचालन, सिद्धासन किया करें।

 

◆ दमा के लिए- सुप्तवज्रासन, सर्पासन, सर्वांगासन, पवनतुक्तासन, उष्ट्रासन करें।

◆ रक्तचाप के लिए– योगमुद्रासन, सिद्धासन, शवासन, शक्तिसंचालन क्रिया करें।

 

◆ सिर दर्द के लिए- सर्वांगासन, सर्पासन, वज्रासन, धनुरासन, शतुरमुर्गासन करें।

 

◆ पाचन शक्ति बढ़ाने के लिए- यानासन, नाभि आसन, सर्वांगासन, वज्रासन करें।

 

◆ मधुमेह के लिए- मत्स्यासन, सुप्तवज्रासन, योगमुद्रासन, हलासन, सर्वांगासन, उत्तानपादासन करें।

 

◆ मोटापा घटाने के लिए– पवनमुक्तासन, सर्वांगासन, सर्पासन, वज्रासन, नाभि आसन करें।

 

◆ आंखों के लिए- सर्वांगासन, सर्पासन, वज्रासन, धनुरासन, चक्रासन करें।

 

◆ बालों के लिए– सर्वांगासन, सर्पासन, शतुरमुर्गासन, वज्रासन करें।

 

◆ प्लीहा के लिए- सर्वांगासन, हलासन, नाभि आसन, यानासन करें।

 

◆ कमर के लिए– सर्पासन, पवनमुक्तासन, सर्वांगासन, वज्रासन, योगमुद्रासन करें।

 

◆ कद बड़ा करने के लिए- ताड़ासन, शक्ति संचालन, धनुरासन, चक्रासन, नाभि आसन करें।

 

◆ कानों के लिए– सर्वांगासन, सर्पासन, धनुरासन, चक्रासन करें।

 

◆ नींद के लिए– सर्वांगासन, सर्पासन, सुप्तवज्रासन, योगमुद्रासन, नाभि आसन करें।

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'ॐ गं हस्ति पिशाचि लिखे स्वाहा ।।

 

ॐ नमो हनुमते रुद्रावताराय सर्वशत्रुसंहारणाय।

सर्वरोग हराय सर्ववशीकरणाय रामदूताय स्वाहा

 

कालतंतु कारेचरन्ति एनर मरिष्णु,निर्मुक्तेर कालेत्वम अमरिष्णु। .

 

ॐ नमस्ते अस्तु भगवन विश्वेश्वराय महादेवाय

त्र्यम्बकाय त्रिपुरान्तकाय त्रिकालाग्निकालाय

कालाग्निरुद्राय नीलकण्ठाय मृत्युंजयाय

सर्वेश्र्वराय सदाशिवाय श्रीमन् महादेवाय नमः।।

 

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"लक्ष्मि आगच्छ अलक्ष्मि निस्सर", for Maha-Lakshmi (Peace/Harmony & Well-being ) & Alakshmi (ill-being/Catastrophe) to leave: Pray for the suffering World, the Peoples, the Nations, the Families and Friends: May the Mother Creatrix herald Peace, Prosperity and Happiness with her effervescent, immanent Light, and immutable Force of Order!

।। यं यं चिन्तयते कामम् तं तं प्राप्नोति निश्चितम्।।

ऊँ शाँतिः, ऊँ शाँतिः ऊँ शान्तिः 🙏🙏🙏

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Alkebulan - Africa - Garden of Eden

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“शठे शाठ्यं समाचरेत्”

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*"श्री.तुलसीदासजी"* से एक भक्त ने पूछा कि...

*"महाराज आप श्रीराम के इतने गुणगान करते हैं , क्या कभी खुद श्रीराम ने आपको दर्शन दिए हैं * ?..

तुलसीदास बोले :- " हां "

भक्त :- महाराज क्या आप मुझे भी दर्शन करा देंगे ???

तुलसीदास :- " हां अवश्य "

★ *तुलसीदास जी ने ऐसा मार्ग दिखाया कि एक गणित का विद्वान भी चकित हो जाए  !!!*

*तुलसीदास जी ने कहा , ""अरे भाई यह बहुत ही आसान है  !!! तुम श्रीराम के दर्शन स्वयं अपने अंदर ही प्राप्त कर सकते हो.""*

*हर नाम के अंत में राम का ही नाम है.*

 

इसे समझने के लिए तुम्हे एक *"सूत्रश्लोक "* बताता हूं .

यह सूत्र किसी के भी नाम में लागू होता है !!!

भक्त :-" कौनसा सूत्र महाराज ?"

*तुलसीदास* :- यह सूत्र है ...

*||"नाम चतुर्गुण पंचतत्व मिलन तासां द्विगुण प्रमाण || || तुलसी अष्ट सोभाग्ये अंत मे शेष राम ही राम || "*

 

 इस सूत्र के अनुसार

★ *अब हम किसी का भी नाम ले और उसके अक्षरों की गिनती करें*...

*१)उस गिनती को (चतुर्गुण) ४ से गुणाकार करें*.

*२) उसमें (पंचतत्व मिलन) ५ मिला लें.*

*३) फिर उसे (द्विगुण प्रमाण) दुगना करें.*

*४)आई हुई संख्या को (अष्ट सो भागे) ८ से विभाजित करें .*

*"" संख्या पूर्ण विभाजित नहीं होगी और हमेशा २ शेष रहेगा!!!  ...

*यह २ ही "राम" है। यह २ अंक ही " राम " अक्षर हैं*...

 

★विश्वास नहीं हों रहा है ना???

चलिए हम एक उदाहरण लेते हैं ...

आप एक नाम लिखें , अक्षर कितने भी हों  !!!

★ उदा. ..निरंजन... ४ अक्षर

१) ४ से गुणा करिए  ४x४=१६

२)५ जोड़िए  १६+५=२१

३) दुगने करिए २१×२=४२

४)८ से विभाजन करने पर  ४२÷८= ५ पूर्ण अंक , शेष २ !!!

*शेष हमेशा दो ही बचेंगे,यह बचे २ अर्थात्  - "राम" !!!*

 

*विशेष यह है कि सूत्रश्लोक की संख्याओं को तुलसीदासजी ने विशेष महत्व दिया है*!!!

★1) *चतुर्गुण* अर्थात् *४ पुरुषार्थ* :- *धर्म, अर्थ, काम,मोक्ष* !!!

★2) *पंचतत्व* अर्थात् ५ *पंचमहाभौतिक* :- *पृथ्वी,

जल, अग्नि, वायु , आकाश*!!!

★3) *द्विगुण प्रमाण* अर्थात् २ *माया व ब्रह्म* !!!

★4) *अष्ट सो भागे* अर्थात् ८ *अाठ दिशायें*

( *चार दिशा* :-पूर्व, पश्चिम, उत्तर, दक्षिण ,

 *चार उपदिशा* - आग्नेय,नैऋत्य, वायव्य, ईशान्य, *आठ प्रकारची लक्ष्मी* (आग्घ, विद्या, सौभाग्य, अमृत, काम, सत्य, भोग आणि योगलक्ष्मी )

 

★अब यदि हम सभी अपने नाम की जांच इस सूत्र के अनुसार करें तो आश्चर्यचकित रह जाएंगे कि हमेशा शेष २ ही प्राप्त होगा ...

इसी से हमें श्री तुलसीदास जी की  बुद्धिमानी और अनंत रामभक्ति का ज्ञान होता है !!!

🙏🏻 *जय श्रीराम* 🙏🏻

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१- यह अधोलिखित पद्य और उनके भावार्थ से पता चलता है। 

 

 

*कःखगौघाङचिच्छौजा झाञ्ज्ञोऽटौठीडडण्ढणः।*

 

*तथोदधीन् पफर्बाभीर्मयोऽरिल्वाशिषां सहः॥*

 

अर्थात्- पक्षिओं का प्रेम, शुद्ध बुद्धि का , दुसरे का बल अपहरण करने में पारंगत, शत्रु। संहारको में अग्रणी, मनसे निश्चल तथा निडर और महासागर का सर्जन करता कौन? राजा मय कि जिसको शत्रुओं के भी आशीर्वाद मिले हैं। "

आप देख सकते हैं कि संस्कृत वर्णमाला के सभी 33 व्यंजन इस पद्य में आ जाते हैं इतना ही नहीं, उनका क्रम भी योग्य है। 

 

२- एक ही अक्षरों का अद्भूत अर्थ विस्तार...

 

 

माघ कवि ने शिशुपालवधम् महाकाव्य में केवल "भ" और "र " दो ही अक्षरों से एक श्लोक बनाया है। 

 

 

*भूरिभिर्भारिभिर्भीभीराभूभारैरभिरेभिरे।* 

 

*भेरीरेभिभिरभ्राभैरूभीरूभिरिभैरिभा:।।* 

 

अर्थात्- धरा को भी वजन लगे ऐसा वजनदार, वाद्य यंत्र जैसा अवाज निकाल ने वाले और मेघ जैसा काला निडर हाथी ने अपने दुश्मन हाथी पर हमला किया। "

 

३- किरातार्जुनीयम् काव्य संग्रह में केवल " न " व्यंजन से अद्भूत श्लोक बनाया है और गजब का कौशल्य का

प्रयोग करके भारवि नामक महाकवि ने थोडे में बहुत कहा है...

 

*न नोननुन्नो नुन्नोनो नाना नाना नना ननु।* 

 

*नुन्नोऽनुन्नो ननुन्नेनो नानेना नन्नुनन्नुनुत्।।* 

 

 

अर्थात् - जो मनुष्य युद्ध में अपने से दुर्बल मनुष्य के हाथों घायल हुआ है वह सच्चा मनुष्य नहीं है। ऐसे ही अपने से दुर्बल को घायल करता है वो भी मनुष्य नहीं है। घायल मनुष्य का स्वामी यदि घायल न हुआ हो तो ऐसे मनुष्य को घायल नहीं कहते और घायल मनुष्य को घायल करें वो भी मनुष्य नहीं है।

 

*●ऐसे अनेक मधुर उदाहरण हमारे अन्यान्य पुरातन संस्कृत साहित्य के ग्रन्थों में ही देखने को मिलता है।*

 

*वन्दे संस्कृतम्।*

 

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कुछ #भारतीय संस्थानों के ध्येय वाक्य -

भारतस्य कस्याश्चन संस्थायाः ध्येयवाक्यानि -

 

Republic of India

''सत्यमेव जयते" 

(मुण्डकोपनिषद् )

 

Nepal

''जननी जन्मभूमिश्च स्वर्गादपि गरीयसि"

(वात्मीकि रामायणम्‌)

 

Goverment of Kerala

''तमसो मा ज्योतिर्गमय"

(बृहदारण्यकोपनिषद्‌ )

 

Goverment of Goa

''सर्वे भद्राणि पश्यन्तु मा कश्चित् दुःखमाप्नुयत् "

(कठोपनिषद्‌)

 

Research and Analysis Wing (RAW)

''धर्मो रक्षति रक्षितः''

(मनुस्मृतिः)

 

National Academy of Legal Studies and Research University - Andhra Pradesh

''धर्मे सर्वं प्रतिष्ठितम्''

 

Centre for Environmental Planning and Technology (CEPT)

''ज्ञानं विज्ञानसहितम्''

(भगवद्गीता)

 

Life Insurance Corporation of India (LIC)

''योगक्षेमं वहाम्यहम्''

(भगवद्‌गीता)

 

Institute of Chartered Accountants of India (ICAI)

''या एषा सुप्तेषु जागृति''

(कठोपनिषद्‌)

 

Indian Navy

''शं नो वरुण:''

(तैत्तिरियोपनिषद्‌)

INS (Indian Naval Ship) Vikrant

''जयेम शं युद्धि स्पर्द्धा''

(ऋग्वेदः)

 

INS Mysore

''न बिभेति कदाचन''

(महोपनिषद्‌)

 

INS Delhi

''सर्वतो जयम् इच्छामि''

(सुभाषितम्)

 

INS Mumbai

''अहं पर्याप्तं त्विदमेतेषां बलम्''

(भगवद्गीता)

 

INS Shivaji

''कर्मसु कौशलम्''

(भगवद्गीता)

 

INS Hamla

''श्रद्धावान् लभते ज्ञानम्''

(भगवद्गीता)

 

INS Valsura

''तस्य भासा सर्वमिदं विभाति''

(कठोपनिषद्‌)

 

INS Chilka

''उद्यमेन हि सिद्धयन्ति कार्याणि''

(पञ्चतन्त्रम्)

 

Indian Air Force

''नभस्पृशं दीप्तम्‌''

(भगवद्गीता)

 

Indian Coast Guard

''वयं रक्षामह''

(वात्मीकि रामायणम्)

 

Tourism Development Corporation of India

''अतिथि देवो भव''

(तैत्तिरियोपनिषद्‌)

Reserve Bank of India

''बुद्धौ शरणमन्विच्छ''

(भगवद्गीता)

 

All India Institute of Medical Sciences

''शरीरमाद्यं खलु धर्मसाधनम्''

(कुमारसंभवम्)

 

Andhra University

''तेजस्विनावधीतमस्तु"

(कठोपनिषद्‌)

 

CUSAT Kochi

''तेजस्विनावधीतमस्तु"

(कठोपनिषद्‌)

 

Mysore University

''न हि ज्ञानेन सदृशम्''

(भगवद्गीता)

 

Nizam Institute of Medical Sciences -Andhra Pradesh

''सर्वे सन्तु निरामयाः''

(श्रीशङ्कराचार्यः)

 

University of Calicut

"निर्माय कर्मणा श्री"

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भगवान विष्णु के १६ नामों का एक छोटा श्लोक प्रस्तुत है ।  इसमें मनुष्य को किस किस अवस्थाओं में भगवान विष्णु को किस किस नाम से स्मरण करना चाहिए, इसका उल्लेख किया गया है :-

 

*औषधे चिंतयते विष्णुं ,*

*भोजन च जनार्दनम |*

*शयने पद्मनाभं च*

*विवाहे च प्रजापतिं ||*

 

*युद्धे चक्रधरं देवं*

*प्रवासे च त्रिविक्रमं |*

*नारायणं तनु त्यागे*

*श्रीधरं प्रिय संगमे ||*

 

*दु:स्वप्ने स्मर गोविन्दं*

*संकटे मधुसूदनम् |*

*कानने नारसिंहं च*

*पावके जलशायिनाम ||*

 

*जल मध्ये वराहं च*

*पर्वते रघुनन्दनम् |*

*गमने वामनं चैव*

*सर्व कार्येषु माधवम् |*

 

*षोडश एतानि नामानि*

*प्रातरुत्थाय य: पठेत ।*

*सर्व पाप विनिर्मुक्ते,*

*विष्णुलोके महियते ।।*

 

(१) औषधि लेते समय - विष्णु ;

(२) भोजन के समय - जनार्दन ;

(३) शयन करते समय - पद्मनाभ :

(४) विवाह के समय - प्रजापति ;

(५) युद्ध के समय - चक्रधर ;

(६) यात्रा के समय - त्रिविक्रम ;

(७) शरीर त्यागते समय - नारायण;

(८) पत्नी के साथ - श्रीधर ;

(९) नींद में बुरे स्वप्न आते समय - गोविंद ;

(१०) संकट के समय - मधुसूदन ;

(११) जंगल में संकट के समय - नृसिंह ;

(१२) अग्नि के संकट के समय - जलाशयी ;

(१३) जल में संकट के समय - वाराह ;

(१४) पहाड़ पर संकट के समय - रघुनंदन;

(१५) गमन करते समय - वामन;

(१६) अन्य सभी शेष कार्य करते समय - माधव

 

*हरे राम् हरे राम् राम् राम् हरे हरे*

*हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे*

*ॐ विष्णवै नमः 🚩*

 🙏

https://upanishads.org.in/upanishads/4/3/1/1

मुण्डकोपनिषद्तृतीयो मुण्डकःप्रथमः खण्डःVerse १

 

Verse

 

द्वा सुपर्णा सयुजा सखाया समानं वृक्षं परिषस्वजाते।

तयोरन्यः पिप्पलं स्वाद्वत्त्यनश्नन्नन्यो अभिचाकशीति ॥

 

Transliteration

 

dvā suparṇā sayujā sakhāyā samānaṁ vṛkṣaṁ pariṣasvajāte |

tayoranyaḥ pippalaṁ svādvattyanaśnannanyo abhicākaśīti ||

 

Anvaya

 

सयुजा सखाया द्वा सुपर्णा समानं वृक्षं परिषस्वजाते। तयोः अन्यः पिप्पलं स्वादु अत्ति। अन्यः तु अनश्नन् अभिचाकशीति ॥

 

Anvaya Transliteration

 

sayujā sakhāyā dvā suparṇā samānaṁ vṛkṣaṁ pariṣasvajāte| tayoḥ anyaḥ pippalaṁ svādu atti| anyaḥ ( tu ) anaśnan abhicākaśīti ||

 

Meaning

 

Two birds, beautiful of wing, close companions, cling to one common tree: of the two one eats the sweet fruit of the tree, the other eats not but watches his fellow.

 

Hindi Meaning

 

दो सुन्दर पंखों वाले पक्षी, घनिष्ठ सखा, समान वृक्ष पर ही रहते हैं; उनमें से एक वृक्ष के स्वादिष्ट फलों को खाता है, अन्य खाता नहीं अपितु अपने सखा को देखता है।

 

Glossary

 

सयुजा सखाया - sayujā sakhāyā - close

companions | द्वा सुपर्णा - dvā suparṇā - two birds, beautiful of wing | समानम् वृक्षम् - samānam vṛkṣam - one common tree | परिषस्वजाते - pariṣasvajāte - clinging to | तयोः - tayoḥ - of the two | अन्यः - anyaḥ - one | स्वादु पिप्पलम् - svādu pippalam - the sweet fruit of the tree | अत्ति - atti - eats | अन्यः - anyaḥ - the other | अनश्नन् - anaśnan - eats not | अभिचाकशीति - abhicākaśīti - but watches his fellow |

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काव्यांशों की सप्रसंग व्याख्याएँ।

 

साजि चतुरंग-सैन अंग में उमंग धारि,

सरजा सिवाजी जंग जीतने चलत है।

भूषन भनत नाद बिहद नगारन के,

नदीनद मद गैबरन के रलत है।

ऐलफल खैलभैल खलक में गैल-गैल,

गजन की तैलपैल सैल उसलत है।

तारा सौ तरनि धूरिधारा में लगत

जिमि थारा पर पारा पारावार यों हलत है।

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कठिन शब्दार्थ-साजि = सजाकर। चतुरंग सैन = हाथी, घोड़े, रथ और पैदल सैनिक चार अंगों से युक्त सेना। अंग = शरीर। उमंग = उत्साह। धरि = धारण करके। सरजा = शिवाजी की उपाधि। जंग = युद्ध। भनत = कहते हैं। नाद= शब्द। बिहद = भारी, घोर। नगारन के = युद्ध के नगाड़ों के। नद = विशाल नदी। मद = मत्त हाथी की कनपटी से टपकने वाला द्रव। गैबरन = हाथियों। रलत है = बहते हैं। ऐल फैल = सेना के फैलने या चलने से। खैल-मैल = खलबली, भय। खलक = संसार। गैल-गैल = गली-गली या सभी मार्गों पर। गजन की = हाथियों की वैल-पैल = धक्कों से। सैल = पर्वत। उसलत = उखड़ते। तारा सौ = तारे के समान (छोटा)। तरनि = सूर्य। धूरि-धारा = धूल का उड़ना। जिमि = जैसे। धारा = थाल। पारा = एक द्रव अवस्था में रहने वाली धातु। पारावार = समुद्र। यों हलते है = इस प्रकार हिलता है।

 

संदर्भ तथा प्रसंग-प्रस्तुत कवित्त छंद हमारी पाठ्यपुस्तक में संकलित क़वि भूषण के छंदों से लिया गया है। इस छंद में कवि, शिवाजी की विशाल सेना के युद्ध के लिए जाते हुए समय का अतिशयोक्तिपूर्ण वर्णन कर रहा है। व्याख्या-कवि भूषण कहते हैं-जब शिवाजी युद्ध में विजय पाने के लिए विशाल सेना सजाकर और मन में उत्साह भर कर चलते हैं तो सेना के नगाड़ों का भारी नाद गूंजने लगता है। हाथियों की कनपटियों से टपकने वाले मद से नदी और नद बहने लगते हैं। शिवाजी की सेना के आगे बढ़ने पर सारे संसार की गली-गली में खलबली मच जाती है और सेना के असंख्य हाथियों के धक्कों से पर्वत भी उखड़ने लगते हैं। विशाल सेना के चलने से उड़ने वाली धूल में सूर्य भी एक तारे के जैसा टिमटिमाता दिखाई देता है और धरती के हिलने से समुद्र भी इस प्रकार डोलने लगता है जैसे थाल पर रखा पारा थाल को लेकर चलने पर इधर-उधर ढुलको करता है।

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शेष महेश गणेश दिनेश , सुरेश जाहि निरंतर गावे ।

जाहि अनादि अनंत अखंड , अछेद अभेद सुवेद बतावे ।।

नारद से शुक व्यास रटे , पवि हारे तऊ पुनि पार ना पावे ।।

ताहि अहीर की छोहरिया ,छछिया भर छाछ पे नाच नचावे ।। -

 

 अर्थ : शेष यानी शेषनाग महेश यानी शिवजी दिनेश यानी सूर्यदेव, सुरेश यानी इंद्रदेव यह सब देवता गण जिसकी पूजा करते हैं जिसको अनादि यानी जिसका उद्भव ना अंत पता है, जिसके खंड नही किए जा सकते हैं जिस में छेद ना किए जा सकते हो, भेदना संभव नहीं है ऐसा वेद बताते हैं ।नारद शुक व्यास जैसे ऋषि मुनि इनके बारे में जानने का प्रयत्न करते हैं पर हार जाते हैं । ऐसे श्री कृष्ण जी को अहीरों की लड़कियां थोड़ा-थोड़ा मक्खन दिखाकर नाचने को कहती हैं वह नाचते भी है. ॐ ॐ ॐ

 

मातृवत् परदारेषु परद्रव्येषु लोष्ठवत्।

आत्मवत् सर्वभूतेषु यः पश्यति सः पण्डितः।।

 

अर्थात जिसकी दृष्टि में पराई नारियां माता के समान हैं, पराया धन मिट्टी के ढेले के समान है और सभी प्राणी अपने ही समान हैं, वही ज्ञानी है।

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नवधा भक्ति

श्रीरामचरितमानस अरण्यकाण्ड

 

💕भगवान् श्रीराम जब भक्तिमती शबरीजी के आश्रम में आते हैं तो भावमयी शबरीजी उनका स्वागत करती हैं, उनके श्रीचरणों को पखारती हैं, उन्हें आसन पर बैठाती हैं और उन्हें रसभरे कन्द-मूल-फल लाकर अर्पित करती हैं। प्रभु बार-बार उन फलों के स्वाद की सराहना करते हुए आनन्दपूर्वक उनका आस्वादन करते हैं। इसके पश्चात् भगवान राम शबरीजी के समक्ष नवधा भक्ति का स्वरूप प्रकट करते है I ✨

 

✨नवधा भगति कहउँ तोहि पाहीं । सावधान सुनु धरु मन माहीं ॥

प्रथम भगति संतन्ह कर संगा। दूसरि रति मम कथा प्रसंगा ॥

 

💕अर्थात् :- मैं तुझसे अब अपनी नवधा भक्ति कहता हूँ। तू सावधान होकर सुन और मन में धारण कर । पहली

भक्ति है संतों का सत्संग | दूसरी भक्ति है मेरे कथा प्रसंग में प्रेम ।

 

 ✨गुर पद पंकज सेवा तीसरि भगति अमान।

चौथि भगति मम गुन गन करइ कपट तजि गान ||

 

💕अर्थात् :-तीसरी भक्ति है अभिमानरहित होकर गुरु के चरण कमलों की सेवा करना और चौथी भक्ति यह है कि कपट छोड़कर मेरे गुण समूहों का गान करें अर्थात कीर्तन करना भक्ति है ।

 

✨मंत्र जाप मम दृढ़ बिस्वासा । पंचम भजन सो बेद प्रकासा ॥

छठ दम सील बिरति बहु करमा । निरत निरंतर सज्जन धरमा ॥

 

💕अर्थात् :- मेरे (राम) मंत्र का जाप और मुझमें दृढ़ विश्वास - यह पाँचवीं भक्ति है, जो वेदों में प्रसिद्ध है। छठी भक्ति है इंद्रियों का निग्रह, शील (अच्छा स्वभाव या चरित्र), बहत कार्यों से वैराग्य और निरंतर संत पुरुषों के धर्म (आचरण) में लगे रहना ।

✨सातवँ सम मोहि मय जग देखा । मोतें संत अधिक करि लेखा ॥

आठवँ जथालाभ संतोषा। सपनेहुँ नहिं देखइ परदोषा ॥

 

💕अर्थात् :- सातवीं भक्ति है जगत् भर को समभाव से मुझमें ओतप्रोत (राममय) देखना और संतों को मुझसे भी अधिक करके मानना। आठवीं भक्ति है जो कुछ मिल जाए, उसी में संतोष करना और स्वप्न में भी पराए दोषों को न देखना ।

 

✨नवम सरल सब सन छलहीना। मम भरोस हियँ हरष न दीना ||

नव महुँ एकउ जिन्ह कें होई । नारि पुरुष सचराचर कोई ॥

 

💕अर्थात् :- नवीं भक्ति है सरलता और सबके साथ कपटरहित बर्ताव करना, हृदय में मेरा भरोसा रखना और किसी भी अवस्था में हर्ष और दैन्य (विषाद ) का न होना। इन नवों में से जिनके एक भी होती है, वह स्त्री-पुरुष, जड़-चेतन कोई भी हो I

 

✨सोइ अतिसय प्रिय भामिनि मोरें । सकल प्रकार भगति दृढ़ तोरें ।।

 

जोगि बृंद दुरलभ गति जोई। तो कहुँ आजु सुलभ भइ सोई॥

 

💕अर्थात् :- हे भामिनि! मुझे वही हे अत्यंत प्रिय है। फिर तुझ में तो सभी प्रकार की भक्ति दृढ़ है । अतएव जो गति

योगियों को भी दुर्लभ है, वही आज तेरे लिए सुलभ हो गई है ।

 

✨💕✨💕जय श्री राम 💕✨💕

तं सूर्यं जगत्कर्तारं महातेजः प्रदीपनम् ।

महापापहरं देवं तं सूर्यं प्रणमाम्यहम् ॥

 

महान तेज के प्रकाशक, जगत के कर्ता, महापापहारी उन सूर्य भगवान को मैं नमस्कार करता हूँ।

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इस मंत्र से मिलेगा विष्णु सहस्रनाम स्त्रोत्र का लाभ:

 

'नमो स्तवन अनंताय सहस्त्र मूर्तये, सहस्त्रपादाक्षि शिरोरु बाहवे।

सहस्त्र नाम्ने पुरुषाय शाश्वते, सहस्त्रकोटि युग धारिणे नम:।।'

यह एक श्लोक है, जिस का असर उतना ही है, जितना कि विष्णु सहस्रनाम स्त्रोत्र का है. रोज सुबह इस एक मंत्र का जाप करने से जीवन में आने वाली कठिनाइयों से मुक्ति मिलती है.

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Tulasi apane raam ko

Bhajan karo nishank.

Aadi ant nibhayiein

Jaise nav ko ank.

 

---------- Awadhoot gita

Vyaadh gita

Vidhur Gita

Shiv gita

 

 

 

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